लव फिक्शन और किक बॉक्सिंग के चारों ओर घूमती फ़िल्म लाइगर

Vivek Ranjan
7 Min Read

सिनेमाघरों में विजय देवरकोंडा व अनन्या पांडे अभिनित फिल्म लाइगर बीते दिन रिलीज हुई। मार्शल आर्ट व किकबॉक्सिंग को केंद्र में रखकर धर्मा प्रोडक्शन बैनर तले बनी इस स्पोर्ट फिक्शन ड्रामा मूवी में विजय को एक हकलाते हुए कैरेक्टर ‘ लाइगर ‘ के रूप में दिखाया गया है। कहानी की शुरुआत में ही विजय देवरकोंडा की एंट्री जबर्दस्त दिखाई गई। जहां पर वो गुंडों को पीटकर एक व्यक्ति की जान बचाता है। कहानी प्रेम, इमोशन ,मारपीट और बॉक्सिंग के इर्द गिर्द घूमती नजर आती है। पूरी जगन्नाथ के निर्देशन में हिंदी-तेलगू मिक्स थीम का प्रयोग कर इस फ़िल्म को बनाया गया। पहले जान लेते हैं इस फ़िल्म की कहानी चलती कैसे है…

लाइगर के पिता मार्शल आर्ट व बॉक्सिंग के बड़े खिलाड़ी रह चुके होते हैं। लाइगर के छोटे रहते ही उनके पिता की मौत हो जाती है। उसके बाद उसकी मां बालामनी( राम्या कृष्णन ) ही उसको पाल पोस कर बड़ा करती है। उसकी मां का सपना होता है कि जो सपना उसके पिता ने देखा था उसको उसका बेटा पूरा करे। इसी के लिए उसकी मां दिन रात मेहनत करके अपने बेटे को उस लायक बनाती है कि उसका बेटा उस सपने को पूरा करे। उसको लेकर वो मार्शल आर्ट के एक कोच (जो कि लाइगर के पिता के दोस्त रह चुके होते हैं) के पास जाती है। लाइगर की मां की हालत ऐसी नही रहती कि उसको मार्शल आर्ट सिखाने की फीस वो कोच को दे पाती। फीस न दे पाने की बात सुनकर पहले तो कोच( रोनित रॉय) लाइगर को मार्शल आर्ट सिखाने से मना कर देते हैं पर जब उसकी मां अपने पति की बात बताती है तो कोच तैयार हो जाते हैं क्योंकि उसके पिता के बॉक्सिंग के प्रति जुनून को वो देख चुके होते हैं।

लाइगर को हकलाने की वजह से काफी दिनों तक उसके साथ के लोगों द्वारा इंसर्ट का सामना करना पड़ा। मगर धीरे धीरे उसके बॉक्सिंग को देखकर लोग उसे अपना दोस्त बनाने लगे। लाइगर अब अपने टीम का हीरो बन जाता है। इसी बीच सोशल मीडिया पर रील्स बनाकर फेमस होने वाली तान्या (अनन्या पांडे) की उससे मुलाकात होती है। तान्या को लगता है कि उसके हर रील्स पर उल्टा सीधा कॉमेंट करने वाला लड़का लाइगर है। वह उससे भिड़ जाती है और अपने भाई संजू (विशू रेड्डी) जो खुद एक बॉक्सिंग खिलाड़ी रहता है,से पिटवाने की धमकी देती है। मगर जब वो लाइगर की फाइटिंग को देखती है तो उससे प्यार कर बैठती है। उधर कोच का साफ साफ कहना था कि लड़कियों से दूर रहना। एक दिन जब।    फोन करती है तो लाइगर की मां उसे लाइगर से दूर हो जाने को बोलती है। जन्मदिन के दिन लाइगर उसे भगा ले जाता है जिसपर लाइगर को उसके भाई का सामना करना पड़ता है। कहानी मोड़ लेती है और अनन्या लाइगर से दूर हो जाती है जब उसे पता चलाता है कि लाइगर हकलाता है,जबकि लाइगर एक बार पार्टी में उसे बता चुका होता है। लाइगर को एक झटका सा लगता है, मगर इसी बात पर वो ठान लेता है कि एक दिन वो उसे जवाब देकर रहेगा।

नैशनल चैंपियनशिप का समय आता है। लाइगर नेशनल लेवल चैंपियनशिप में सबको हराकर जीत हासिल करता है। इस बीच वो  के भाई संजू को भी हरा देता है।

इंटरनेशनल चैंपियनशिप के लिए कोच को कोई स्पॉन्सर नही मिलता जिससे कोच व पूरी टीम निराश हो जाती है। उसी समय (अली) की एंट्री फिर से होती है जिसे लाइगर ने गुंडों से बचाया था। कहानी घूम जाती है। अली अपने बड़े भाई (चंकी पांडे) से अपने दोस्त की मदद को बोलता है। चंकी बच्चन अपना पर्सनल जेट भेजते हैं टीम वहां पहुंचती है। फाइनल से पहले पार्टी चल रही होती है जिसमे कहानी में एक अलग ही राज का पर्दाफाश होता है कि बिजनेसमैन( चंकी पांडे) ही तान्या के पिता है और ये सब उन्हींने तान्या के कहने पर किया। तान्या को एकाएक अंडरवर्ड द्वारा किडनैप कर लिया जाता है जिसे बचाने के लिए लाइगर अंडरवर्ड से भिड़ने निकल पड़ता है। फाइटिंग और मारपीट से कुछ देर फ़िल्म चलती है। जब वो तान्या को बचाने के लिए अंडरवर्ड के सामने पहुंचता है तो देखता है कि वो तो मार्क हैंडरसन (माइक टाइसन) है,जिनकी फ़ोटो वो अपने घर मे लगाया है। वो उनसे तान्या को वापस देने की बात कहता है। फिर दोनों की आपस मे बॉक्सिंग होती है और उधर फाइनल चैंपियनशिप के मैदान में इन दोनों की बॉक्सिंग का लाइव प्रसारण होने लगता है। अंत मे लाइगर मार्क हैंडरसन को हरा देता है और तान्या को वापस लाता है।

फ़िल्म में गाने हैं। धूम धड़ाका है। मौज मस्ती के साथ कहानी में फैंटेसी है। निर्देशक और लेखक पूरी जगन्नाथ ने हिंदी-तेलगू मिक्स कर युवा पीढ़ी के लोगों के बीच इसे देखने और हिट होने जैसा सम्वाद और एक्ट डाला है। दर्शकों में कोई खास इंटरेस्ट नही दिखा इस फ़िल्म को लेकर। ज्यादातर दर्शक यही बोलते नज़र आये कि वन टाइम वाच मूवी है। फ़िल्म में हीरो सबकी वाट लगाते हुए निकलता जा रहा है और सब उसी के पीछे चल रहे हैं। बालामनी का किरदार निभाने वाली राम्या कृष्णन के रोल को देखकर ज्यादा लोगों का कहना है कि वो बाहुबली के किरदार से बाहर ही नही आ रही थीं और अनन्या पांडेय को गाना गाना था डांस करना था जो वो करके चली गयी। विजय देवरकोंडा की मेहनत इस फ़िल्म में दिखी है और एक अच्छे कोच के रूप में रोनित रॉय ने भी बढ़िया किरदार निभाया है। बाकि हिंदी डबिंग में करन जौहर की 90’s की फिल्मों के इमोशन औऱ डायलाग काफी रिपीट हुए है।

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स्वतंत्र पत्रकार, फ़िल्म देखने व समीक्षा लिखना। घूमना व सम सामयिक घटनाओं को लेखन में दर्ज करना
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