‘पोनीयन सेलवन देखनी है तो होमवर्क करके जाएँ!’ कवयित्री संध्या नवोदिता की नज़र से ‘PS-1’

मुंबई:- मणि रत्नम की फ़िल्म पोनियन सेलवन इस समय कमाई के मामले में सबसे आगे है। फ़िल्म ने इस साल की सभी फिल्मों को पीछे छोड़ दिया है। फ़िल्म के लिए काफ़ी सकारात्मक टिप्पड़ियां लिखी जा रही हैं। ऐसी ही एक समीक्षा आयी है शहर इलाहाबाद से,जिसे लिखा है संध्या नवोदिता ने। आप भी पढें…

मणि रत्नम आपको चोल युग तक ले जाने में कामयाब हुए हैं.

अगर आप सोच रहे हैं कि साउथ की फ़िल्म है और ‘जय माहिष्मती’ कहने से काम चल जायेगा तो आप गलत सोच रहे हैं. साउथ की हर फ़िल्म ‘दृश्यम’ या ‘बाहुबली’ नहीं होती कि पहुँच गये टिकट बुक करा के, और आनंद मिल गया.

इस फ़िल्म में अगर आप ऐसे ही चले गये तो आप कुछ भी नहीं समझ पायेंगे. मुझसे भी यह गलती हुई और मैं फ़िल्म देखते हुए उसकी स्टोरी नेट पर खोज-खोज कर समझ रही थी.

इसका कारण यह था कि मुझे फिल्म को सरप्राइज की तरह देखना अच्छा लगता है. मतलब आप हॉल में पहुंच जाएं, और आपको बिल्कुल ना पता हो स्टोरी क्या है, थीम क्या है. यहाँ तक कि उसमें एक्टर्स कौन-कौन हैं, यह भी ना पता हो.

इस लिहाज से तो इस पिक्चर ने पूरी तरह सरप्राइज कर दिया.

उस समय तक हिन्दू शब्द प्रचलन में नहीं था, फ़िल्म में आर्य- अनार्य या सनातन शब्द भी नहीं आते.

हिन्दी प्रदेशों का मानस अधिकांश घटनाओं को हिन्दू मुसलमान की बाइनरी में देखने का अभ्यस्त बना दिया गया है. पर इस फ़िल्म में ऐसा मानस किसके खिलाफ खड़ा होगा! यह प्री-मुग़ल युग था और लगभग एक ही धर्म के मानने वाले राजा आपस में भयानक युद्ध लड़ रहे थे.

सत्ता के लिये सब एक-दूसरे की जान के दुश्मन थे. चोलों के बारे में कहा जाता है कि युद्ध में उन्होंने स्त्रियों और बच्चों तक की हत्याएं की.

फ़िल्म की कहानी की स्पीड तो ठीक है लेकिन शॉट्स की स्पीड इतनी तेज़ है कि लगता है कैमरामैन कहीं तूफान में उड़ते हुए अपना कैमरा किसी तरह थामे है, एक सेकंड में चार दृश्य आँखों से गुजरते हैं.

हिन्दी वालों को इतने तेज़ भागते शॉट्स पकड़ने की आदत नहीं होती. समुद्री तूफान हो या युद्ध के विराट दृश्य, लगता है मणिरत्नम कैमरे को कहीं एक जगह फिक्स करा दें, पिक्चर हम खुद समझ लेंगे. दृश्यों को पकड़ने में आँखें और दिमाग पनाह माँग गये.

फिल्म के हर दृश्य से यह लगता ही है कि फिल्म मणि रत्नम की है. फिल्म पर उनकी छाप है. विजुअल्स बहुत शानदार हैं. लोकेशंस गजब हैं. समुद्र के दृश्य तो अद्भुत हैं.

बाकी मसाले भी पिक्चर में हैं. सुंदर लड़कियाँ और उनकी अदाएँ. आज भी किसी खूबसूरत अदाकारा के परदे पर आने पर दर्शक सीटियां बजाते हैं. लोगों की सीटी और उनके उत्साह से ही पता लग रहा था कि उन्हें ऐश्वर्या राय और तृषा बहुत पसंद आ रही हैं.

सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है पिक्चर की स्टोरी. मणिरत्नम इसे थोड़ा सरल तरीके से समझा सकते थे. लेकिन कहानी को डेढ़ -दो मिनट के वक्तव्य में समझाने की कोशिश की गई जो एकदम नाकाफी था. तमिल में स्थानों और व्यक्तियों के नाम समझने में हिन्दी वालों को वक़्त लगता है. अंत तक कुछ समझ में आना शुरू हो कि फ़िल्म का दि एन्ड हो जाता है.

क्योंकि हिन्दी दर्शकों को कहानी समझ में नहीं आ रही थी इसलिए लोग किसी भी पात्र से कनेक्ट नहीं कर पा रहे थे. किसी पात्र को युद्ध में चोट लग रही थी उसके साथ रो नहीं पा रहे थे. कोई युद्ध जीत रहा था उसके लिए ताली नहीं बजा पा रहे थे.

अगर फिल्म दिखाने से पहले 10 मिनट चोल शासकों और अन्य महत्वपूर्ण डायनेस्टी जैसे राष्ट्रकूट, पल्लव, पांड्या आदि के शजरे के बारे में बता दिया जाता तो हिंदी दर्शक को कहानी समझने में आसानी होती.

लेकिन मणिरत्नम कोई इतिहास के शिक्षक तो हैं नहीं. और यूपी को इतिहास पढ़ने की आदत नहीं. व्हाट्सऐप्प आने के बाद तो यूपी के ज्यादातर लोग इतिहास बनाने और फॉरवर्ड करने में व्यस्त हो गये हैं, पढ़ने का समय किधर है! जितना समय पढ़ने में लगाएंगे उससे कम में मनचाहा इतिहास बनाकर वायरल कर देंगे.

कहना मुश्किल है कि इस फिल्म में तथ्य कितने हैं और कहानी कितनी है. यह फिल्म कल्कि कृष्णमूर्ति के उपन्यास पर आधारित है.

वे 1951 से 1954 तक अपनी पत्रिका कल्कि में साप्ताहिक स्टोरी लिख रहे थे जिसका नाम था पोनीयन सेलवन. लेखक और पत्रिका दोनों का नाम कल्कि है.

लेखक और पत्रकार कल्कि दसवीं पास थे उनका अपना चरित्र भी बहुत दिलचस्प है. आपको इन्हें खोज कर जरूर पढ़ना चाहिए.

ये साप्ताहिक एपिसोड तमिल जनता ने बहुत पसंद किए. जबकि उस समय लिटरेसी रेट बहुत कम था, आजादी के चंद साल हो पाए थे. कहते हैं कि इन एपिसोड को पढ़ने के लिए लोग तमिल सीख रहे थे.

एपिसोड खत्म होते-होते पता लगा कि यह 2000 पेज से ज्यादा की किताब बन गई. सरकार ने इसकी लोकप्रियता को देखते हुए इस किताब के प्रचार-प्रसार की पूरी छूट दी और बिना किसी कॉपीराइट के किसी को भी अधिकार दे दिया कि वह किसी भी भाषा में इस किताब को प्रकाशित और प्रसारित कर सकता है.

यह कहानी चोल वंश के सबसे प्रतापी राजा राजराजा प्रथम (947-1014) के बारे में है. चोल शासकों ने बाहरी देशों पर खूब आक्रमण किये और जैसे ब्रिटेन ने अपने अधीन तमाम देश रखे थे ऐसे ही चोलों ने समुद्र पार करके श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया, बर्मा, थाईलैंड, कम्बोडिया आदि देशों को उपनिवेश बनाया.

बताते हैं कि चोल राजाओं की नौसेना बहुत मजबूत थी.

कहते हैं राजराजा प्रथम इतना दुस्साहसी था कि उसका राज कलिंग-उड़ीसा, दक्षिण – पश्चिम बंगाल से लेकर कम समय के लिये ही सही, पर अयोध्या के पास गोण्डा तक उसका प्रभाव था.

फ़िल्म की स्टारकास्ट प्रभावशाली है. संगीत पर ध्यान नहीं गया क्योंकि कहानी ने उलझा लिया था. संगीत में रवानगी है, ए. आर. रहमान के कमपोजिशन अलग से भी सुने जा सकते हैं.

नृत्य बहुत दिलचस्प हैं. एकदम अलग तरह के.

अगर आप घर से चोल राजाओं का इतिहास पढ़ कर के नहीं गए तो आपको फिल्म में कुछ भी समझ में नहीं आएगा और हो सकता है आपको हाफ टाइम तक भी फिल्म झेलना मुश्किल हो जाए.

अच्छी फिल्मों को देखने के लिए थोड़ी मेहनत तो करनी पड़ती है जब हम हॉलीवुड की फिल्में देखते हैं जैसे मैट्रिक्स या इसी तरह की और फिल्में तो इनके बारे में पढ़ना तो पड़ता है.

अपने इतिहास को जानना चाहते हैं तो फ़िल्म ज़रूर देखने लायक है. थोड़ी मेहनत करके घर से PS1 को जानकर जायेंगे तो बहुत आनंद आएगा.

( संध्या नवोदिता युवा कवयित्री हैं व प्रगतिशील लेखक संघ,उत्तर प्रदेश की सचिव भी हैं। समसामयिक मुद्दों पर लिखती रहती हैं। यह फ़िल्म समीक्षा, उनका स्वयं का विचार है।)

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