सिनेमा का बाजारवाद व नेपोटिज्म: बदलते दौर के सिनेमा में कौन होगा सफल?

Vivek Ranjan
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मुंबई, जब सिनेमा ने पहली बार बिना किसी संवाद के अपनी फ़िल्म को पर्दे पर उतारा होगा तो उसे यह बिल्कुल भी भान नही रहा होगा कि आने वाले समय में सिनेमा पर नेपोटिज्म जैसे आरोप भी लगेंगे। बॉयकॉट बॉलीवुड जैसे ट्रेंड का सामना भी करना पड़ेगा। वो सिनेमा जिसे समाज मे बदलावों के लिए स्थापित किया गया वो एक दिन समाजिक उद्देश्यों को न लेकर बाजारवाद की शिकस्त में आ जायेगा।

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या को लेकर तरह-तरह की बातें की जा रही थी।अलग अलग अनुमान लगाए जा रहे थे।कोई उसे मानसिक बीमारी कह रहा था तो कोई कह रहा था कि सुशान्त इंडस्ट्री के भाई-भतीजावाद का शिकार हुए। यह बातें तब हो रही थीं जब ये घटना ताजी थी। घटना के पुराने होने के साथ साथ ये बातें भी धीमी पड़ गयीं और दर्शक फिर से सामने पड़ने वाले नए सिनेमा का चेहरा स्वीकारने लगे।

‘बॉक्स-ऑफिस पर कमाई’ ।जब  दर्शकों की नज़रें अभिनेता-अभिनेत्री व अन्य किरदारों पर टिकी होती हैं तो सिने जगत से जुड़े लोग निर्देशक,निर्माता व अभिनेता-अभिनेत्री इसकी कमाई पर नज़रें टिकाए रहते हैं। कमाई के आगे उन्हें अपने की भी सुध नही रहती। बड़े बड़े विज्ञापनों से लदा सिनेमा खुद के प्रचार में झूठ-सही सब फैलाने में लगा रहता है। सिनेमा को देखते समय हम सिनेमा की यात्रा व उसके सिद्धान्तों से कोसो दूर होते हैं। हाथ मे पॉपकॉर्न व गर्लफ्रैंड के साथ रोमांस करते हुए सिनेमा हॉल में हमारा दिमाग सिनेमा की तह तक कितना घुस पाता है यह तो देखने वाला अच्छा जानता होगा।

सत्य व वास्तविकता सिनेमा में ही नही,बल्कि समाज से भी दरकिनार होता जा रहा है। आनन्द,प्रेम,रोमांस के बदलते हुए रूपों को लेकर सिनेमा आज जिस जगह पहुंच चुका है वो सबके सामने हैं। अब ज्यादातर लोग फिल्में इसलिए नही देखते या ज्यादातर फिल्में इसलिए नही देखी जाती कि उनका मुद्दा क्या है? उनकी पटकथा क्या है? उनके केंद्रबिंदु में कौन सा समाज है? बल्कि ज्यादातर इसलिए देखी जाती हैं कि उनमें अभिनय करने वाला कौन अभिनेता है।

दर्शकों की इस इच्छा को निर्माता व निर्देशक भी भली भांति जानते हैं। वो ऐसा खेल खेलते हैं कि दर्शकों की दोनो इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। स्टोरी के साथ साथ अभिनेता भी वही रखे जाएंगे जिनका या जिनके परिवार का दशकों से वर्चस्व सिने जगत पर रहा है। कुछ निर्माता निर्देशक इस बने बनाये ढर्रे से दूर कुछ करने की कोशिश करते भी हैं तो वो दर्शकों को सिनेमा हाल तक नही खींच पाते हैं। हां बाद में भले ही उनकी अच्छाई का हवाला देते घूमें।

सिनेमा से जल,जंगल,जमीन,परिवार,रिश्ते अब धीरे -धीरे सीमित हो रहे हैं। सेट के साथ साथ लोगों की भावनाएं भी अब टेम्पररी व आर्टिफिशियल होती जा रही हैं। सेट पर मुस्कान बिखेरने वाले न जाने कितने चेहरे असल जीवन में अवसाद से भरे हैं। कड़वी हवा,पंचलाइट,मसान,पार्च्ड जैसी फिल्में,जिन्होंने समाज के भावनाओं को छुआ व बदलते परिवेश में आने वाले या वर्तमान में व्याप्त संकट को दिखाया,कब आयीं और कब देखी गयी या बॉक्स आफिस पर कितना कमाई कर पाईं ये बहुत कम को ही पता होगा।

सिनेमा के स्वरूप को बदलने में जिन परिवार का बड़ा योगदान रहा है ,उनमें कपूर खानदान सबसे बड़ा है। कुछ दशकों में तो इनके परिवार की बाढ़ सी आ गयी थी। जब अभिनय की पाठशाला व भरत के नाट्यशास्त्र की पढ़ाई करने वाले कुछ अभिनेताओं का पदार्पण सिने जगत में हुआ तो उनकी शुरुआती फिल्में ऐसी रही कि जिनको आधुनिक सिनेमा में बहुत ही पिछड़ा व बोरिंग कहा जाता है। ओम पुरी,शबाना आज़मी,दीप्ति नवल,नसीरुद्दीन,इऱफान खान,नवाजुद्दीन,राधिका आप्टे,संजय मिश्रा, आदि अभिनेताओं ने सिनेमा के कुछ रीति रिवाजों को बदलने का प्रयास किया और काफी हद तक सफल भी हुए।

70 से 90 के दशक में सिर्फ़ प्रेम व रोमांस पर ही सिनेमा की रील नही घूम रही थी। उस समय वो अभिनेता भी संघर्ष कर रहे थे जिनके आगे पीछे सिनेमा में कोई पूछने वाला नही था।तमाम खर्च के बावजूद जब ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी फ़िल्म के फ्लॉप होने पर कपूर खानदान आशिकों को लुभाने के लिए ‘बॉबी’ फ़िल्म बनाया तभी से न जाने कितने अभिनेताओं,निर्देशकों व निर्माताओं को यह लगने लगा कि बीच,बिकनी व बेड सिनेमा के पर्दे पर लाना आवश्यक है।

इसके बाद तो फिल्मों में यह मनोरंजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होने लगा। एक प्रकार से कहें तो फिल्मों को ‘A’ ग्रेड कहकर ‘B’ बनाने की कवायद कई प्रोडक्शन ने शुरू कर दी । अब सिनेमा के केंद्र में समाज का बदलाव नही बल्कि बाजार व दर्शकों का व्यक्तिगत आनन्द है।

इस धारा से जो हटे वो या तो सिने-जगत में बाबूगिरी करने वाले लोगों द्वारा उपेक्षित किये गए या फिर हार मानकर अपना जीवन बसर करने लगे। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि सिनेमा भी परिवारवाद की जद से बाहर निकलने को तैयार नही है।

सिनेमा व समाज दोनों आपस मे उलझ चुके हैं। इस उलझन ने सिनेमा के साहित्य व परिवेश को ही बदलकर रख दिया है। कुछ फिल्में अभिनेताओं के कारण फ्लॉप हो रही हैं ,तो कुछ विषयवस्तु को लेकर। अभिनेता भी अभिनय व व्यक्तिगत जीवन में अंतर स्पष्ट नही कर पा रहे हैं। जिसका खामियाजा उन्हें अपनी फिल्मों में भुगतना पड़ रहा।इसमे नुकसान उन लोगों का है जो फ़िल्म जगत में अभी अपना नाम बना रहे हैं।
लेकिन व्यवसायिक फिल्मों के बरक्स कुछ ऐसी फिल्में भी आ रही जो मध्यम व निम्न वर्ग को छू रही हैं भले हो वो कमाई न कर रही हों। नवाज,पंकज त्रिपाठी,संजय मिश्रा,मनोज वाजपेयी जैसों ने चेहरे के नाम पर बिकने वाले सिनेमा में एक अलग पहचान बनाई है।

तो क्या यह कहा जा सकता है कि अभिनय प्रधानता व सामाजिक मुद्दों पर बनी फिल्मों की मांग सिनेमा में बढी है?,दर्शकों ने सिनेमा एक अलग रूप को स्वीकारना शुरू कर दिया है? यह आने वाले समय मे दर्शक तय करेंगे।

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स्वतंत्र पत्रकार, फ़िल्म देखने व समीक्षा लिखना। घूमना व सम सामयिक घटनाओं को लेखन में दर्ज करना
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