Matto ki Saikil Review लोकतंत्र के सामने एक गहरा प्रश्न छोड़ गया ‘मट्टो’ और बयां कर गया गरीबी,बेबसी और लाचारी में जीते समाज की कहानी

Vivek Ranjan
8 Min Read

मट्टो की साइकिल फ़िल्म आज रिलीज हो गयी। सिनेमाघरों में लोग जब फ़िल्म देखकर निकल रहे तो किसी की ज़बान पर गांव-देहात है तो कोई कह रहा कि वो जब गांव जाते हैं तो ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं। कुछ लोग तो भावुक भी थे। जिनकी खूबसूरत प्रतिक्रियाएं ये बता रही थी कि फ़िल्म की कहानी और दृश्यों की ताकत क्या है। प्रकाश झा को देखकर ज्यादा दर्शक अचंभे में हैं। उनका कहना है कि ये तो सब एक्टर्स पर भारी पड़ गया है। बड़े बजट की फिल्मों के आगे इस तरह की प्रतिक्रियाओं का मिलना किसी फिल्म के लिए उसकी दूरगामी सोच व सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहना दिखाता है। मट्टो की साइकिल की यही असली कमाई है,जो दर्शकों की आंखें नम कर दे रही।

क्या है फ़िल्म की कहानी,आइये जानते हैं-

मट्टो (प्रकाश झा) नाम का एक गरीब मज़दूर,उसकी पत्नी( अनिता चौधरी) व दो बेटियों नीरज(आरोही शर्मा) व लिम्का की कहानी। गांव में रहकर जीवन बसर कर रहा यह परिवार रोज की कमाई पर निर्भर है। भारत की ज्यादातर आबादी ऐसी हो है जो रोज की कमाई पर ही अपना जीवन यापन करती है। बेटी सरोज मोतियों की माला बनाने का काम करती है और मट्टो रोज दिहाड़ी मज़दूरी करने बाहर। एक ठेकेदार है,जो मट्टो को काम दिलाता रहता है। मट्टो के पास उसकी एक टूटी-जर्जर साइकिल है,जिसमे रोज कुछ न कुछ खराबी ही रहती है। फिर भी मट्टो का वही एकमात्र सहारा है। सपना है कि दिहाड़ी मज़दूरी ठीक ठाक मिले तो एक साइकिल ले लेगा। मगर क्या करे,कितना कमाए कितना बचाये। जो मिलता है,उसमे राशन पानी का खर्च और ऊपर से कर्ज चुकता करना अलग। मट्टो का ही दोस्त है कल्लू मिस्त्री( डिंपी मिश्रा),जो मट्टो की साइकिल को ठीक करता रहता है। कभी कभार तो मट्टो खुद ही छोटी मोटी खराबी ठीक कर लेता है। उसे लगता है कि कब तक फ्री में काम कराएंगे,मगर कल्लू उसकी बेबसी को समझता है। कभी साइकिल की चेन खराब तो कभी स्टैंड,कभी चक्का डग तो कभी हैंडल खराब। मट्टो का जीवन भी तो ऐसा ही है,बिल्कुल उसकी साइकिल की तरह। बेटी ब्याहने लायक हो रही,उसकी चिंता अलग। पत्नी बीमार पड़ गयी तो अलग। कुल मिलाकर उसकी बेबसी,लाचारी और गरीबी की मार के चलते वह अपना आर्थिक सन्तुलन नही बना पाता। एक दिन मज़दूरी से लौटते समय उसकी साइकिल पर ट्रैक्टर चढ़ जाता है। मानों मट्टो पर पहाड़ सा टूट गया। वह चिल्लाता है,रोता है,भागता है मगर क्या करे। वो ट्रैक्टर और ये साइकिल। पल भर के लिए ऐसा लगता है कि सब कुछ ठहर सा गया हो। यही पर फ़िल्म का इंटरवल हो जाता है। आगे के आधे भाग में मट्टो सपने में नई साइकिल का सपना देख रहा होता है। और उसी सपने को पूरा करने के लिए वो कल्लू की मदद से उधार एक साइकिल लेता है। कुछ पैसा उसके पास जमा पूंजी और कुछ नीरज की मोतियों की माला से मिले पैसे को इकट्ठा कर। साइकिल घर मे आने से उसका घर मंदिर सा लगने लगा था। लिम्का साइकिल की घण्टी बजाकर खुश होती। घण्टी की आवाज मानों मंदिर में बज रही मधुर घण्टियों की आवाज सी लगती।
गांव में प्रधानी का चुनाव होता है और सिकन्दर चौधरी चुनाव जीत जाते है। चुनाव से पहले सिकन्दर के लिए मट्टो बड़ा प्रिय रहता है। उसे प्रधान से काफी उम्मीदें रहती हैं। मगर एक दिन दिहाड़ी से लौटते वक्त उसकी साइकिल को चोर छीन लेते हैं। मट्टो उनसे बहुत जूझता है मगर कुक नही होता। वह चिल्लाते हुए एक पुलिस के पास जाता है,मगर वहां भी निराशा हाथ लगती है। पुलिस वाहन चेकिंग को छोड़कर उसकी साइकिल ढूंढना मुनासिब नही समझती। वह एफ आई आर के लिए पोलिस स्टेशन जाता है मगर वहां से भी दुत्कार दिया जाता है। एरोप्लेन,कार और मोटरसाइकिल के दौर में मट्टो की साइकिल कहां ठहरती है? जनसमस्या के निदान के लिए बने प्रधान जी आगरा से लौटे हैं,और साथ मे बड़ी कार ख़रीद कर लाये हैं। वही आखिरी उम्मीद थे मट्टो के लिए। गाड़ी की पूजा हो रही होती है। मट्टो पूजा के बीच मे ही रोते हुए प्रधान से अपनी साइकिल के चोरी होने की बात बताता है। मगर ये क्या,प्रधान का आदमी मट्टो को धक्का देकर गिरा देता है। मट्टो के गिरते ही मानों लोकतंत्र और संविधान औंधे मुंह गिर गया हो। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर बच्चे हाथों में तिरंगा लिए गीत गाते जा रहे – सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा। कल्लू और नीरज के कंधों पर सहारा लिए मट्टो उनके बगल से जा रहा होता है। जिसके चेहरे पर साफ झलक रही थी- टूटी उम्मीद,अधूरा सपना और झूठी मिली दिलासा।

एम.गनी जिन्होंने निर्देशन से भरी फ़िल्म में जान…


यह कहानी मथुरा के रहने वाले रंगकर्मी व फिल्ममेकर एम.गनी ने लिखी थी। उनको कई साल लग गए इस फ़िल्म को एक मुकम्मल पहचान देने में। जब प्रकाश झा ने यह कहानी सुनी तो तुरंत तैयार हो गए। दमदार निर्देशन के लिए जाने जाने वाले प्रकाश झा ने इसमें अभिनय की जो छाप छोड़ी है कि देखकर दर्शक भी अचंभित है। इसके सम्वाद लिखे हैं पुलकित फिलिप ने और सम्पादन किया है कामेश कर्ण ने। प्रकाश झा प्रोडूक्शन से रिलीज हुई यह फ़िल्म पहले अपने ट्रेलर से ही काफी सुर्खियों में आ गयी थी।

थिएटर से जुड़े रंगकर्मियों ने छोड़ी अमिट छाप..

अनिता चौधरी( मट्टो की पत्नी), डिंपी मिश्रा (मट्टो का दोस्त कल्लू), आरोही शर्मा (मट्टो की बड़ी बेटी नीरज) ने बड़े ही भावनात्मक तरीके से अभिनय किया,जो हृदय को छू लेने वाला है।

सम्वाद और दृश्य ऐसे हैं कि आप एक पल के लिए भी नज़र नही हटा सकते। आपको कुछ भी बनावटी या शूटिंग जैसा नही लगेगा,ऐसा लगेगा जैसे उन दृश्यों मे आप भी कहीं न कहीं हैं और सब आस पास घटते देख रहे हैं।

यह फ़िल्म सामाजिक व राजनीतिक पहलुओं को छूती दिखती है। लोकतंत्र की ताकत तो गांव हैं फिर ये गांव विकास की मुख्य धारा से नदारद क्यों। फ़िल्म को देखकर लगेगा कि भारत की आत्मा भले गांव हों,मगर यह आत्मा दुखी है। उच्च व निम्न के मध्य एक खाई,जो लगातार बढ़ती जा रही। मट्टो जैसे लोग,व्यवस्था में सिर्फ वोटबैंक हैं बाकी कुछ नही। वो जी रहे है तो बस एक झूठी उम्मीद के सहारे…

रिपोर्ट- विवेक रंजन

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स्वतंत्र पत्रकार, फ़िल्म देखने व समीक्षा लिखना। घूमना व सम सामयिक घटनाओं को लेखन में दर्ज करना
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